Introduction
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।"
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस आधुनिक भारत का उद्घोष था जिसकी नींव स्वामी विवेकानंद ने रखी थी। आज, 12 जनवरी, उनकी जयंती को भारत 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनाता है। उनका दर्शन, जिसे उन्होंने 'व्यावहारिक वेदांत' (Practical Vedanta) कहा, धर्म को गुफाओं और मंदिरों से निकालकर आम आदमी के जीवन और राष्ट्र की सेवा से जोड़ने का एक क्रांतिकारी प्रयास था।
आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है (जनसांख्यिकीय लाभांश/Demographic Dividend)। 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करने के लिए जिस ऊर्जा, चरित्र और नेतृत्व की आवश्यकता है, वह विवेकानंद के विचारों में मिलती है। इस वर्ष के उत्सव का केंद्र बिंदु युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदार बनाना है।
Core Concept: व्यावहारिक वेदांत (Practical Vedanta) क्या है?
अक्सर वेदांत दर्शन को सांसारिक जीवन से वैराग्य (त्याग) के रूप में देखा जाता था। विवेकानंद ने इसकी नई व्याख्या की, जिसे 'नव-वेदांत' (Neo-Vedanta) भी कहा जाता है।
- जीवन में आध्यात्मिकता:उन्होंने कहा कि वेदांत केवल हिमालय की गुफाओं के लिए नहीं है। इसे कार्यस्थल, खेतों और कारखानों में उतारा जाना चाहिए।"धर्म रसोई घर में नहीं है और न ही 'मुझे मत छुओ' की संकीर्णता में है।"
- दरिद्र नारायण की सेवा (Service to the Poor):यह उनके दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। उन्होंने कहा, "जीवे प्रेम करे जेई जन, सेई जन सेविछे ईश्वर" (जो जीवों से प्रेम करता है, वही ईश्वर की सेवा करता है)।उन्होंने गरीब को 'दरिद्र नारायण' कहा और माना कि नर सेवा ही नारायण सेवा है।
- आत्म-विश्वास (Faith in Self):व्यावहारिक वेदांत का अर्थ है अपनी अंतर्निहित दिव्यता और क्षमता में विश्वास करना। उन्होंने युवाओं से कहा, "पुरानी दुनिया में वह नास्तिक था जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता था, नई दुनिया में नास्तिक वह है जो खुद में विश्वास नहीं करता।"
राष्ट्र निर्माण में प्रासंगिकता
1. शिक्षा और चरित्र निर्माण (GS Paper 4):
विवेकानंद के अनुसार, शिक्षा केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं है ("Education is not the amount of information that is put into your brain"). शिक्षा का उद्देश्य 'मानव निर्माण' (Man-making) और 'चरित्र निर्माण' (Character-building) होना चाहिए। आज की शिक्षा नीति (NEP 2020) भी इसी समग्र विकास पर जोर देती है।
2. सार्वभौमिक सहिष्णुता (Universal Tolerance):
1893 में शिकागो धर्म संसद में उन्होंने जिस 'स्वीकार्यता' (Acceptance) की बात की थी, वह आज की ध्रुवीकृत दुनिया में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था कि सभी धर्म एक ही सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं।
3. राष्ट्रवाद (Nationalism):
उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था, बल्कि वह आध्यात्मिकता और मानवतावाद पर आधारित था। उन्होंने भारत को केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक 'जीवंत शक्ति' माना।
विवेकानंद के प्रमुख सिद्धांत
सिद्धांत | विवरण |
दरिद्र नारायण | ईश्वर को गरीबों और पीड़ितों में देखना। |
अभय (Fearlessness) | "शक्ति ही जीवन है, कमजोरी ही मृत्यु है।" |
सार्वभौमिक धर्म | कोई धर्म श्रेष्ठ या हीन नहीं, सभी सत्य हैं। |
सेवा योग | कर्म योग का आधुनिक रूप - समाज सेवा के माध्यम से मोक्ष। |
Practice Questions
1. Prelims MCQ:
स्वामी विवेकानंद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- उन्होंने 1893 में पेरिस में आयोजित विश्व धर्म संसद में भाग लिया था।
- उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो सामाजिक सेवा और सुधार पर केंद्रित था।
- उन्होंने 'प्रबुद्ध भारत' नामक पत्रिका शुरू की थी।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) (कथन 1 गलत है, धर्म संसद शिकागो (अमेरिका) में आयोजित हुई थी, पेरिस में नहीं।)
2. Mains Question:
"स्वामी विवेकानंद का 'व्यावहारिक वेदांत' (Practical Vedanta) केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं था, बल्कि भारत के सामाजिक और राजनीतिक उत्थान के लिए एक रूपरेखा (Blueprint) थी।" चर्चा करें। (10 अंक, 150 शब्द)
Conclusion
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को "लोहे की मांसपेशियां और स्टील की नसों" (Muscles of iron and nerves of steel) वाला बनने का आह्वान किया था। आज राष्ट्रीय युवा दिवस पर, हमें उनके इस संदेश को याद रखना चाहिए कि एक राष्ट्र का निर्माण ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के चरित्र और त्याग से होता है।